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प्राइवेसी बनाम ट्रांसपेरेंसी

प्राइवेसी बनाम ट्रांसपेरेंसी

प्रसंग

सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट, 2005 और डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023 के बीच एक बड़ा संवैधानिक टकराव सामने आया है । यह टकराव इस बात पर है कि एक नागरिक का जानने का अधिकार कहाँ खत्म होता है और एक व्यक्ति का डिजिटल प्राइवेसी का अधिकार कहाँ से शुरू होता है।

 

मुख्य संघर्ष

यह तनाव दो अलग-अलग मकसद वाले अहम कानूनों से पैदा होता है:

  • ट्रांसपेरेंसी (RTI): इसका मकसद नागरिकों को जानकारी तक पहुंच देकर सरकार को जवाबदेह बनाना है।
  • प्राइवेसी (DPDP): इसका मकसद लोगों के पर्सनल डेटा को बिना इजाज़त के जानकारी या प्रोसेसिंग से बचाना है।

 

विधायी ढांचा: पहले बनाम बाद में

DPDP एक्ट ने पूरी तरह से बदल दिया है कि पब्लिक अथॉरिटीज़ पर्सनल डेटा से जुड़ी जानकारी के अनुरोधों को कैसे संभालती हैं।

विशेषता

आरटीआई अधिनियम (मूल धारा 8(1)(जे))

डी.पी.डी.पी. अधिनियम (संशोधित धारा 44(3))

मानक

अगर पर्सनल जानकारी बड़े पब्लिक इंटरेस्ट से जुड़ी हो या पब्लिक एक्टिविटी से जुड़ी हो, तो उसे बताने की इजाज़त है।

पब्लिक इंटरेस्ट की परवाह किए बिना पर्सनल जानकारी शेयर करने पर पूरी तरह रोक है

विवेक

पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर (PIOs) प्राइवेसी और जनता की जानने की ज़रूरत के बीच बैलेंस बना सकते हैं।

अपनी मर्ज़ी की पावर हटा दी गई है; पर्सनल डेटा अब पूरी तरह से छूट है।

जवाबदेही

नागरिक बेनिफिशियरी लिस्ट, सरकारी अधिकारियों की सैलरी और संपत्ति वेरिफाई कर सकते हैं।

सरकारी ऑफिस अब पर्सनल डेटा की सुरक्षा का हवाला देकर इन डिटेल्स को देने से मना कर सकते हैं।

 

प्रमुख चिंताएँ और चुनौतियाँ

  • आरटीआई का कमजोर होना: आलोचकों का तर्क है कि डीपीडीपी अधिनियम के माध्यम से आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1 )( जे) में संशोधन करके सरकार ने जांच के खिलाफ एक "कानूनी ढाल" बना लिया है।
  • भ्रष्टाचार का खतरा: सरकारी भर्ती, सोशल सिक्योरिटी बेनिफिशियरी (जैसे MGNREGA), और सरकारी अधिकारियों के काम से जुड़ी जानकारी मिलना मुश्किल हो सकता है, जिससे "घोस्ट बेनिफिशियरी" या भाई-भतीजावाद को पहचानना मुश्किल हो जाएगा।
  • "पर्सनल जानकारी" का बहाना: सरकारी ऑफिस पर्सनल डेटा की बड़ी परिभाषा का इस्तेमाल करके सही और ज़रूरी जानकारी देने से मना कर सकते हैं, जो एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रांसपेरेंसी के लिए ज़रूरी है।
  • अदालत का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने (जैसे, जस्टिस केएस पुट्टास्वामी केस में) माना कि दोनों अधिकार बुनियादी हैं। हालांकि, DPDP एक्ट में मौजूदा "पूरी तरह" रोक को कई लोग ज़्यादा मानते हैं।

 

आगे बढ़ने का रास्ता

  • तालमेल: कानून का मतलब "प्राइवेट" पर्सनल डेटा (घर का पता, मेडिकल रिकॉर्ड) और "पब्लिक" पर्सनल डेटा (प्रोजेक्ट के बेनिफिशियरी के नाम, ऑफिशियल खर्च) के बीच फर्क करना चाहिए।
  • पब्लिक इंटरेस्ट ओवरराइड: DPDP फ्रेमवर्क के अंदर "पब्लिक इंटरेस्ट टेस्ट" को फिर से शुरू करना ताकि यह पक्का हो सके कि सीक्रेसी के लिए ट्रांसपेरेंसी की बलि न दी जाए।
  • इंडिपेंडेंट ओवरसाइट: डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड और इन्फॉर्मेशन कमीशन को डेटा डिस्क्लोजर से जुड़े झगड़ों को सुलझाने के लिए मिलकर काम करने के लिए सशक्त बनाना।
  • एनॉनिमाइज़ेशन: पब्लिक अथॉरिटीज़ एनॉनिमाइज़्ड फ़ॉर्मेट में डेटा देने के लिए टेक्नोलॉजी अपना सकती हैं , जिससे ट्रांसपेरेंसी की ज़रूरत पूरी होती है और लोगों की पहचान भी सुरक्षित रहती है।

 

निष्कर्ष

प्राइवेसी और ट्रांसपेरेंसी के बीच बैलेंस कोई ज़ीरो-सम गेम नहीं है। 21वीं सदी में डिजिटल डेटा की सुरक्षा ज़रूरी है, लेकिन इसे एडमिनिस्ट्रेटिव ओपेसिटी का टूल नहीं बनना चाहिए। एक मज़बूत डेमोक्रेसी के लिए एक फाइन-ट्यून्ड लीगल सिस्टम की ज़रूरत होती है जो पब्लिक की आँखों को बंद किए बिना इंडिविजुअल डिग्निटी का सम्मान करे।

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