जन गण मन (राष्ट्रगान) की तुलना में वंदे मातरम (राष्ट्रगीत) का कानूनी स्टेटस अक्सर जांच के दायरे में आता है । हाल ही में कोर्ट में सफाई और सरकारी गाइडलाइंस में हर एक के लिए ज़रूरी प्रोटोकॉल और पालन के लेवल को तय करने की कोशिश की गई है।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्टीकरण:
सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया है कि अगर कोई व्यक्ति राष्ट्रीय गीत, वंदे मातरम के लिए खड़ा होने या उसे गाने से मना करता है , तो उसके खिलाफ कोई क्रिमिनल केस नहीं चलाया जा सकता। हालांकि इस गाने की भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक खास और सम्मानित जगह है, लेकिन कोर्ट इसे गाने को ज़रूरी कानूनी ज़िम्मेदारी के बजाय सलाह के तौर पर देखता है।
संवैधानिक ढांचा:
गृह मंत्रालय (MHA) के निर्देश:
सरकारी कामों के दौरान दोनों रचनाओं की गरिमा बनाए रखने के लिए, MHA ने खास सीक्वेंसिंग गाइडलाइंस जारी की हैं:
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विशेषता |
विवरण |
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संगीतकार |
बंकिम चंद्र चटर्जी |
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स्रोत |
आनंदमठ (1882) उपन्यास में शामिल |
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पहली संगीत रचना |
रवींद्रनाथ टैगोर के संगीत पर आधारित और गाया हुआ |
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राजनीतिक गोद लेना |
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान एक राजनीतिक संदर्भ में गाया गया था |
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जन लोकप्रियता |
बंगाल के बंटवारे के बाद 1905 के स्वदेशी आंदोलन का राष्ट्रगान बन गया |
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स्थिति |
1950 में इसे नेशनल सॉन्ग के तौर पर अपनाया गया, जिससे इसे नेशनल एंथम के सम्मान में "बराबर का दर्जा" मिला। |
हालांकि लोगों के दिलों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड में वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर सम्मान मिला हुआ है, लेकिन कानूनी तौर पर इसकी जगह अलग है। राष्ट्रगान के लिए कोई ज़रूरी सज़ा का नियम न होना दिखाता है कि न्यायपालिका का इरादा इसे अपनी मर्ज़ी से देशभक्ति दिखाने का मामला बनाना है, न कि सरकार का दिया हुआ आदेश।