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अपहरण

अपहरण

प्रसंग

दिल्ली में 807 लोगों के लापता होने की रिपोर्ट है , यानी रोज़ाना औसतन 27 मामले । नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ी चिंता सामने आई है, क्योंकि इस छोटे से समय में 137 बच्चों का पता नहीं चल पाया है, जिसमें किशोर लड़कियों की तरफ़ ज़्यादा झुकाव है।

 

समाचार के बारे में

संकट की परिभाषा: किडनैपिंग एक स्ट्रक्चर्ड बिज़नेस बन गया है, जहाँ क्रिमिनल ग्रुप सिस्टमैटिक तरीके से लोगों को फिरौती, ह्यूमन ट्रैफिकिंग, ज़बरदस्ती मज़दूरी या सेक्सुअल एक्सप्लॉइटेशन के लिए किडनैप करते हैं।

प्रमुख डेटा रुझान (2015–2026):

  • कमज़ोरी का अंतर: किशोर लड़कियां (12-18 साल) मुख्य टारगेट हैं; जनवरी 2026 में, 137 लापता नाबालिगों में से 120 लड़कियां थीं।
  • लंबे समय का बैकलॉग: 2015 से 2025 के बीच, दिल्ली में लगभग 5,559 बच्चे लापता हुए, जिनमें से लगभग 700 का अभी भी कोई पता नहीं है।
  • रिकवरी की चुनौतियाँ: रिकवरी रेट अभी भी कम है, पिछले दस सालों में नेशनल कैपिटल में लगभग 11% लापता बच्चे बिना किसी सुराग के रह गए हैं।
  • ज्योग्राफिक हॉटस्पॉट: दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे मेट्रोपॉलिटन हब में आबादी की ज़्यादा संख्या और माइग्रेशन से मिली गुमनामी की वजह से ज़्यादा रेट देखने को मिलते हैं।

 

संगठित अपहरण के पीछे के कारण

  • ट्रैफिकिंग नेटवर्क: अपहरण से घरेलू गुलामी और जिस्म के व्यापार के लिए गैर-कानूनी बाज़ार मिलते हैं (जैसे, 2024 में बच्चों को ज़बरदस्ती मज़दूरी के लिए पड़ोसी राज्यों में ले जाने वाले इंटरस्टेट गैंग पर कार्रवाई)।
  • आर्थिक तंगी: गरीबी की वजह से नाबालिग काम के लिए घर से भाग जाते हैं, जिससे वे नई दिल्ली रेलवे स्टेशन जैसे ट्रांज़िट पॉइंट पर ट्रैफिकर्स के लिए आसान टारगेट बन जाते हैं।
  • टेक्नोलॉजी से लालच देना: अपराधी सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम/फेसबुक) का इस्तेमाल करके किशोरों को "हनी-ट्रैपिंग" या धोखाधड़ी वाले जॉब/मॉडलिंग ऑफर देकर फंसाते हैं।
  • निगरानी में कमी: ज़्यादा आबादी वाले इलाकों और झुग्गी-झोपड़ियों (जैसे, निज़ामुद्दीन और जहांगीरपुरी) में अक्सर CCTV कवरेज की कमी होती है, जिससे आपराधिक गतिविधियों के लिए "डार्क स्पॉट" बन जाते हैं।
  • घरेलू ट्रिगर: खराब घरेलू माहौल और घरेलू हिंसा की वजह से अक्सर "भागने वाले" मामले सामने आते हैं, जिन्हें ऑर्गनाइज़्ड सिंडिकेट जल्दी से पकड़ लेते हैं।

 

सुरक्षा निहितार्थ और चुनौतियाँ

  • अंतर-राज्यीय अधिकार क्षेत्र के मुद्दे: तस्कर पीड़ितों को राज्य की सीमाओं के पार इतनी तेज़ी से ले जाते हैं कि पुलिस तालमेल नहीं रख पाती, जिससे उनका पता लगाने में बहुत देरी होती है।
  • रिसोर्स की कमी: दिल्ली की एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स (AHTU) पर केस की संख्या बहुत ज़्यादा है, और उन्हें स्टाफ की भी बहुत कमी का सामना करना पड़ रहा है।
  • एडवांस्ड लॉजिस्टिक्स: गैंग अब डिजिटल फुटप्रिंट से बचने के लिए एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन (Signal) और नकली लाइसेंस प्लेट वाली चोरी की गाड़ियों का इस्तेमाल करते हैं।
  • पहचान मिटाना: अपराधी बरामद पीड़ितों को नई पहचान देने के लिए आधार कार्ड जैसे नकली डॉक्यूमेंट बनाते हैं , जिससे कानूनी और माता-पिता की पहचान में रुकावट आती है।

 

मौजूदा ढांचा और पहल

  • ऑपरेशन मुस्कान/मिलाप: दिल्ली पुलिस द्वारा चलाया गया डेडिकेटेड रेस्क्यू और रिहैबिलिटेशन ड्राइव।
  • ZIPNET (ज़ोनल इंटीग्रेटेड पुलिस नेटवर्क): उत्तर भारतीय राज्यों में लापता लोगों की जानकारी शेयर करने के लिए एक रियल-टाइम डेटाबेस।
  • फेशियल रिकॉग्निशन सिस्टम (FRS): AI-बेस्ड सॉफ्टवेयर जिसका इस्तेमाल अलग-अलग शेल्टर होम में मौजूद बच्चों से लापता बच्चों का मिलान करने के लिए किया जाता है।
  • ट्रैकचाइल्ड पोर्टल: यह एक नेशनल डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम है जिसे कमज़ोर बच्चों के लिए अलग-अलग राज्यों में तालमेल बिठाने में मदद के लिए बनाया गया है।

 

आगे बढ़ने का रास्ता

  • प्रेडिक्टिव पुलिसिंग: किडनैपिंग हॉटस्पॉट और पीक टाइम की पहचान करने के लिए AI का इस्तेमाल करें ताकि कमज़ोर इलाकों में पेट्रोलिंग को बेहतर बनाया जा सके।
  • AHTUs को मज़बूत करना: हर ज़िले में साइबर-फ़ोरेंसिक्स और विक्टिम साइकोलॉजी में स्पेशल ट्रेनिंग के साथ एक डेडिकेटेड टास्क फ़ोर्स बनाना।
  • कम्युनिटी इंटीग्रेशन: रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWAs) और मोहल्ला कमेटियों को अर्ली वॉर्निंग सिस्टम के तौर पर शामिल करें ।
  • ज़ीरो FIR पोर्टेबिलिटी: पक्का करें कि किसी लापता व्यक्ति के लिए "ज़ीरो FIR" से सभी नेशनल ट्रांज़िट हब पर तुरंत, ऑटोमैटिक अलर्ट आ जाए।
  • पब्लिक अवेयरनेस: स्कूलों और झुग्गी-झोपड़ियों में ऑनलाइन ग्रूमिंग और बिना वेरिफ़ाई किए नौकरी के ऑफ़र के खतरों के बारे में खास तौर पर जानकारी दें।

 

निष्कर्ष

2026 में गुमशुदा लोगों के मामलों में बढ़ोतरी शहरी सुरक्षा में सिस्टम की कमज़ोरी को दिखाती है। ऑर्गनाइज़्ड किडनैपिंग से निपटने के लिए रिएक्टिव ट्रेसिंग से एक प्रोएक्टिव, टेक-ड्रिवन स्ट्रैटेजी की ज़रूरत है जो बिना किसी रुकावट के इंटर-स्टेट कोऑपरेशन और कम्युनिटी विजिलेंस के ज़रिए ट्रैफिकिंग नेटवर्क को खत्म करे।

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