केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने न्यू ड्रग्स एंड क्लिनिकल ट्रायल्स (NDCT) रूल्स, 2019 में बड़े बदलावों को नोटिफाई किया है । इन सुधारों को आम बोलचाल की भाषा में "क्विक पिल" पहल कहा जाता है, जिसका मकसद फार्मास्यूटिकल R&D में "लाइसेंस राज" को खत्म करना है, जिससे लैबोरेटरी रिसर्च से क्लिनिकल एप्लीकेशन तक की टाइमलाइन में काफी तेजी आएगी।
पहला बदलाव यह है कि नॉन-कमर्शियल एक्टिविटीज़ के लिए ट्रेडिशनल, टाइम लेने वाले अप्रूवल प्रोसेस की जगह ट्रस्ट-बेस्ड रेगुलेटरी सिस्टम लाया गया है।
नोट: यह छूट सिर्फ़ नॉन-कमर्शियल मैन्युफैक्चरिंग पर लागू होती है। इस तरीके से बनी कोई भी दवा न तो बेची जा सकती है और न ही कमर्शियली सप्लाई की जा सकती है।
हालांकि नियमों का मकसद बिज़नेस को बड़े पैमाने पर आसान बनाना है, फिर भी कुछ हाई-रिस्क कैटेगरी पर अभी भी कड़ी निगरानी की ज़रूरत है।
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विशेषता |
लाइसेंस से छूट (सिर्फ़ सूचना) |
फॉर्मल लाइसेंस ज़रूरी (टाइमलाइन आधी कर दी गई) |
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दवा के प्रकार |
ज़्यादातर नई केमिकल एंटिटीज़, एनालिटिकल टेस्टिंग, और कम रिस्क वाली BA/BE स्टडीज़। |
भारी जोखिम: साइटोटॉक्सिक ड्रग्स, नारकोटिक्स, साइकोट्रोपिक पदार्थ, सेक्स हॉर्मोन और लाइव बायोलॉजिक्स। |
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टाइप करना सीखो |
स्टैंडर्ड नॉन-क्लिनिकल रिसर्च और खास कम-रिस्क वाली बायोअवेलेबिलिटी स्टडीज़। |
हाई-रिस्क क्लिनिकल ट्रायल या वे जिनमें खास कंट्रोल्ड सब्सटेंस शामिल हों। |
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वैधानिक समयरेखा |
तुरंत (ऑनलाइन जानकारी मिलने पर)। |
से घटाकर 45 दिन कर दिया गया । |
सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइज़ेशन (CDSCO) द्वारा 2016 में लॉन्च किया गया SUGAM पोर्टल, इन सुधारों के लिए डिजिटल बैकबोन का काम करता है।
"क्विक पिल" अमेंडमेंट फार्मास्यूटिकल सेक्टर में "ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस" की तरफ़ एक बड़ी छलांग है। "परमिशन" की जगह "इंटिमेशन" लाकर, सरकार भारतीय रिसर्चर्स की ईमानदारी पर दांव लगा रही है ताकि वे कड़े डॉक्यूमेंटेशन और पोस्ट-फैक्टो ओवरसाइट के ज़रिए सुरक्षा बनाए रखते हुए इनोवेशन को आगे बढ़ा सकें।